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बात छोटी थी, लेकिन गुस्सा बड़ा हो गया! अगर आपका भी पारा जरा-जरा सी बात पर चढ़ जाता है, तो रोज 5 मिनट भ्रामरी प्राणायाम के लिए निकालिए। जानिए इसे करने का सही तरीका और तनाव के बीच यह अभ्यास क्यों उपयोगी माना जाता है। सुबह की शुरुआत ठीक-ठाक हुई थी। चाय भी मिल गई, मोबाइल भी चार्ज था और काम भी समय पर चल रहा था। फिर किसी ने बस एक छोटी-सी बात कह दी... और बस! दिमाग का पारा सीधे 100 डिग्री। आजकल गुस्सा कुछ ऐसा ही हो गया है। ट्रैफिक में किसी ने रास्ता काट दिया, घर में किसी ने बात नहीं मानी, ऑफिस में काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ या मोबाइल पर कोई उल्टा कमेंट कर गया—और हमारा मूड खराब। बाद में जब गुस्सा उतरता है तो अक्सर एक ही सवाल आता है—“इतनी छोटी बात पर इतना गुस्सा क्यों किया?” दरअसल, लगातार तनाव, भागदौड़ और मानसिक दबाव हमारी प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में खुद को कुछ मिनट का शांत समय देना काफी काम आ सकता है। योग में ऐसा ही एक सरल अभ्यास है भ्रामरी प्राणायाम।
भ्रामरी क्या है? नाम थोड़ा मुश्किल, तरीका काफी आसान भ्रामरी का नाम संस्कृत के ‘भ्रमर’ यानी मधुमक्खी से जुड़ा है। इसमें सांस छोड़ते समय मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट की आवाज निकाली जाती है। नाम सुनकर ऐसा मत सोचिए कि इसके लिए योग की कोई बड़ी डिग्री चाहिए! इसे करने के लिए बस शांत जगह, कुछ मिनट का समय और थोड़ी एकाग्रता चाहिए। ऐसे करें भ्रामरी प्राणायाम आराम से बैठिए। चाहें तो जमीन पर पालथी लगाकर बैठें या कुर्सी पर भी सीधे बैठ सकते हैं। अब आंखें बंद करें और शरीर को ढीला छोड़ दें। पहला कदम: नाक से धीरे-धीरे गहरी सांस लें। दूसरा कदम: मुंह बंद रखते हुए सांस को धीरे-धीरे बाहर छोड़ें और “म्...म्...” जैसी मधुर गुनगुनाहट पैदा करें। तीसरा कदम: आवाज को बहुत तेज करने की जरूरत नहीं है। कोशिश करें कि सांस छोड़ते समय ध्यान उसी कंपन और आवाज पर रहे। चौथा कदम: सांस सामान्य होने दें और फिर दोबारा यही प्रक्रिया दोहराएं। शुरुआत में करीब 5 बार करना पर्याप्त हो सकता है। अभ्यास सहज लगे तो धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है।
गुस्से के समय आखिर यह काम कैसे आ सकता है? गुस्से में हमारा ध्यान अक्सर उस बात पर अटक जाता है जिसने हमें परेशान किया है। भ्रामरी में ध्यान सांस और गुनगुनाहट पर लगाने से कुछ समय के लिए उस तनावपूर्ण विचार से दूरी बनाने में मदद मिल सकती है। धीमी और नियंत्रित सांस लेने का अभ्यास शरीर को रिलैक्स महसूस कराने में भी मदद कर सकता है। यानी सामने वाले को जवाब देने से पहले अगर आप 5 मिनट खुद को दे दें, तो हो सकता है कि पांच मिनट बाद वही बात उतनी बड़ी न लगे। कभी-कभी समस्या छोटी होती है, हमारी तत्काल प्रतिक्रिया बड़ी। सुबह करें या रात में? इसका कोई एक समय जरूरी नहीं है। सुबह दिन की शुरुआत से पहले, शाम को काम के तनाव के बाद या रात में सोने से पहले इसे किया जा सकता है। सबसे जरूरी बात है कि इसे नियमित रूप से और आराम से किया जाए। लेकिन एक बात याद रखिए... भ्रामरी प्राणायाम को गुस्से या तनाव का इलाज समझना सही नहीं होगा। यह एक योग अभ्यास है, जो कुछ लोगों को शांत महसूस करने और सांस पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है। अगर गुस्सा लगातार इतना ज्यादा रहता है कि रिश्तों, काम या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ने लगे, तो सिर्फ योग के भरोसे रहने के बजाय योग्य चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। अभ्यास के दौरान चक्कर, सांस लेने में परेशानी या कोई अन्य असहजता महसूस हो तो इसे रोक दें। मालवांचल मित्र का सीधा सवाल हम दिन में मोबाइल को चार्ज करने के लिए समय निकाल लेते हैं, लेकिन अपने दिमाग को ‘रीस्टार्ट’ करने के लिए पांच मिनट नहीं निकाल पाते। शायद जरूरत यही है कि हर बात का जवाब तुरंत देने के बजाय कुछ पल रुकना सीखें। 5 मिनट भ्रामरी के लिए निकालिए। हो सकता है अगली बार गुस्सा आने पर आपका जवाब वही हो, लेकिन अंदाज थोड़ा शांत हो। निष्कर्ष साफ है—गुस्सा आए तो पहले सांस संभालिए, फिर बात संभालिए। |
बात छोटी थी, लेकिन गुस्सा बड़ा हो गया! अगर आपका भी पारा जरा-जरा सी बात पर चढ़ जाता है, तो रोज 5 मिनट भ्रामरी प्राणायाम के लिए निकालिए। जानिए इसे करने का सही तरीका और तनाव के बीच यह अभ्यास क्यों उपयोगी माना जाता है।
सुबह की शुरुआत ठीक-ठाक हुई थी। चाय भी मिल गई, मोबाइल भी चार्ज था और काम भी समय पर चल रहा था। फिर किसी ने बस एक छोटी-सी बात कह दी... और बस! दिमाग का पारा सीधे 100 डिग्री।
आजकल गुस्सा कुछ ऐसा ही हो गया है। ट्रैफिक में किसी ने रास्ता काट दिया, घर में किसी ने बात नहीं मानी, ऑफिस में काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ या मोबाइल पर कोई उल्टा कमेंट कर गया—और हमारा मूड खराब।
बाद में जब गुस्सा उतरता है तो अक्सर एक ही सवाल आता है—“इतनी छोटी बात पर इतना गुस्सा क्यों किया?”
दरअसल, लगातार तनाव, भागदौड़ और मानसिक दबाव हमारी प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में खुद को कुछ मिनट का शांत समय देना काफी काम आ सकता है। योग में ऐसा ही एक सरल अभ्यास है भ्रामरी प्राणायाम।

भ्रामरी क्या है? नाम थोड़ा मुश्किल, तरीका काफी आसान
भ्रामरी का नाम संस्कृत के ‘भ्रमर’ यानी मधुमक्खी से जुड़ा है। इसमें सांस छोड़ते समय मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट की आवाज निकाली जाती है।
नाम सुनकर ऐसा मत सोचिए कि इसके लिए योग की कोई बड़ी डिग्री चाहिए!
इसे करने के लिए बस शांत जगह, कुछ मिनट का समय और थोड़ी एकाग्रता चाहिए।
ऐसे करें भ्रामरी प्राणायाम
आराम से बैठिए। चाहें तो जमीन पर पालथी लगाकर बैठें या कुर्सी पर भी सीधे बैठ सकते हैं।
अब आंखें बंद करें और शरीर को ढीला छोड़ दें।
पहला कदम: नाक से धीरे-धीरे गहरी सांस लें।
दूसरा कदम: मुंह बंद रखते हुए सांस को धीरे-धीरे बाहर छोड़ें और “म्...म्...” जैसी मधुर गुनगुनाहट पैदा करें।
तीसरा कदम: आवाज को बहुत तेज करने की जरूरत नहीं है। कोशिश करें कि सांस छोड़ते समय ध्यान उसी कंपन और आवाज पर रहे।
चौथा कदम: सांस सामान्य होने दें और फिर दोबारा यही प्रक्रिया दोहराएं।
शुरुआत में करीब 5 बार करना पर्याप्त हो सकता है। अभ्यास सहज लगे तो धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है।

गुस्से के समय आखिर यह काम कैसे आ सकता है?
गुस्से में हमारा ध्यान अक्सर उस बात पर अटक जाता है जिसने हमें परेशान किया है। भ्रामरी में ध्यान सांस और गुनगुनाहट पर लगाने से कुछ समय के लिए उस तनावपूर्ण विचार से दूरी बनाने में मदद मिल सकती है।
धीमी और नियंत्रित सांस लेने का अभ्यास शरीर को रिलैक्स महसूस कराने में भी मदद कर सकता है।
यानी सामने वाले को जवाब देने से पहले अगर आप 5 मिनट खुद को दे दें, तो हो सकता है कि पांच मिनट बाद वही बात उतनी बड़ी न लगे।
कभी-कभी समस्या छोटी होती है, हमारी तत्काल प्रतिक्रिया बड़ी।
सुबह करें या रात में?
इसका कोई एक समय जरूरी नहीं है।
सुबह दिन की शुरुआत से पहले, शाम को काम के तनाव के बाद या रात में सोने से पहले इसे किया जा सकता है। सबसे जरूरी बात है कि इसे नियमित रूप से और आराम से किया जाए।
लेकिन एक बात याद रखिए...
भ्रामरी प्राणायाम को गुस्से या तनाव का इलाज समझना सही नहीं होगा। यह एक योग अभ्यास है, जो कुछ लोगों को शांत महसूस करने और सांस पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है।
अगर गुस्सा लगातार इतना ज्यादा रहता है कि रिश्तों, काम या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ने लगे, तो सिर्फ योग के भरोसे रहने के बजाय योग्य चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
अभ्यास के दौरान चक्कर, सांस लेने में परेशानी या कोई अन्य असहजता महसूस हो तो इसे रोक दें।
मालवांचल मित्र का सीधा सवाल
हम दिन में मोबाइल को चार्ज करने के लिए समय निकाल लेते हैं, लेकिन अपने दिमाग को ‘रीस्टार्ट’ करने के लिए पांच मिनट नहीं निकाल पाते।
शायद जरूरत यही है कि हर बात का जवाब तुरंत देने के बजाय कुछ पल रुकना सीखें।
5 मिनट भ्रामरी के लिए निकालिए। हो सकता है अगली बार गुस्सा आने पर आपका जवाब वही हो, लेकिन अंदाज थोड़ा शांत हो।
निष्कर्ष साफ है—गुस्सा आए तो पहले सांस संभालिए, फिर बात संभालिए।