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  • इंजीनियर्स डे : विकास की नींव दिखती नहीं, लेकिन उसी पर पूरा देश खड़ा है

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    इंजीनियर्स डे
    संपादकीय   - नीमच[15-09-2026]
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  • संपादकीय

    आज इंजीनियर्स डे है। यानी वह दिन, जब हम उन लोगों को याद करते हैं जिनकी बनाई चीजों का इस्तेमाल तो हम रोज करते हैं, लेकिन बनाने वाले का नाम अक्सर हमें पता भी नहीं होता। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल से लेकर घर की बिजली, पानी की व्यवस्था, सड़क, पुल, वाहन, अस्पताल की मशीनें, इंटरनेट और फिर दिनभर इस्तेमाल होने वाली तमाम तकनीक—इन सबके पीछे कहीं न कहीं किसी इंजीनियर की सोच, मेहनत और गणना छिपी होती है।

    भारत में इंजीनियर्स डे हर वर्ष 15 सितंबर को मनाया जाता है। यह दिन देश के महान अभियंता और भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। विश्वेश्वरैया ने इंजीनियरिंग को केवल नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया। यही बात आज के दौर में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

    लेकिन इंजीनियरिंग की असली कहानी सिर्फ बड़ी-बड़ी परियोजनाओं, चमचमाते पुलों और ऊंची इमारतों की नहीं है। इसकी असली परीक्षा वहां होती है, जहां सड़क पहली बारिश में टूटती है, नाली बनकर भी पानी सड़क पर बहता है, पुल बनने के कुछ साल बाद मरम्मत मांगने लगता है या किसी भवन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होते हैं।

    यहीं एक सवाल सामने आता है—क्या हमने इंजीनियरिंग को सिर्फ निर्माण तक सीमित कर दिया है या उसे जिम्मेदारी से भी जोड़ा है?

     

    कागज पर सड़क की लंबाई पूरी हो जाती है, बिल पास हो जाता है और उद्घाटन भी हो जाता है। लेकिन जनता के लिए असली उद्घाटन तब होता है, जब बारिश में सड़क बची रहे, ट्रैफिक में पुल काम आए और नाली पानी को सड़क पर आने से रोक दे। आखिर जनता को यह जानने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती कि परियोजना की फाइल कितनी मोटी थी; उसे यह देखना होता है कि काम कितना मजबूत था।

    हल्का व्यंग्य यही है कि हमारे यहां कई बार सड़क बनने से पहले उसका उद्घाटन हो जाता है और सड़क टूटने के बाद उसकी जिम्मेदारी ढूंढी जाती है। इंजीनियर के सामने तकनीकी चुनौती होती है, लेकिन उससे बड़ी चुनौती कई बार व्यवस्था की होती है—समय का दबाव, बजट की सीमा, बदलती जरूरतें और गुणवत्ता को लेकर समझौते का दबाव।

    आज इंजीनियरिंग का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, ड्रोन, स्मार्ट सिटी, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक निर्माण तकनीक ने इंजीनियर की भूमिका को और व्यापक बना दिया है। अब इंजीनियर के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं है कि कुछ बनाया कैसे जाए, बल्कि यह भी है कि उसे कम लागत में, सुरक्षित तरीके से, पर्यावरण का ध्यान रखते हुए और लंबे समय तक उपयोगी कैसे बनाया जाए।

    भारत जैसे विशाल और विविध देश में यह जिम्मेदारी और बड़ी हो जाती है। यहां एक तरफ अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत है तो दूसरी तरफ गांवों में सड़क, सिंचाई, स्वच्छ पानी, बिजली और मजबूत सार्वजनिक ढांचे की भी उतनी ही आवश्यकता है। इसलिए इंजीनियरिंग की सफलता केवल किसी बड़ी परियोजना की ऊंचाई से नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से मापी जानी चाहिए।

    एक अच्छा इंजीनियर वह नहीं जो सिर्फ नक्शा बना दे। अच्छा इंजीनियर वह है जो आने वाले वर्षों की जरूरत को आज समझ सके। जो सुरक्षा को लागत से नीचे न रखे। जो गुणवत्ता को कागज की खानापूर्ति न बनने दे। और सबसे महत्वपूर्ण—जो यह समझे कि उसके हस्ताक्षर केवल एक फाइल पर नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी और सुविधा पर असर डाल सकते हैं।

    आज जब हम इंजीनियर्स डे मना रहे हैं, तब हमें इंजीनियरों से सिर्फ नई सड़कें, नए पुल और नई इमारतें बनाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हमें उनसे बेहतर सोच, टिकाऊ समाधान और ईमानदार तकनीकी निर्णय की उम्मीद भी करनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर समाज और सरकार की भी जिम्मेदारी है कि इंजीनियरों को सही संसाधन, स्वतंत्र तकनीकी निर्णय और गुणवत्ता के लिए आवश्यक समय दिया जाए।

    क्योंकि विकास का मतलब सिर्फ यह नहीं कि हमारे शहर में क्या नया बना। विकास का असली अर्थ यह है कि जो बना है, वह कितने वर्षों तक मजबूती से हमारे काम आता है।

     

    इंजीनियर अक्सर पर्दे के पीछे रहता है। उद्घाटन के मंच पर शायद उसका नाम सबसे बड़े अक्षरों में न लिखा हो, लेकिन जिस पुल से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, जिस पानी की लाइन से घरों तक पानी पहुंचता है और जिस तकनीक से हमारी जिंदगी आसान होती है—वह उसकी सोच की कहानी जरूर कहती है।

    इस इंजीनियर्स डे पर सलाम उन सभी इंजीनियरों को, जो ईंट-पत्थर से ज्यादा भविष्य की नींव रखते हैं।

    और साथ ही एक उम्मीद भी—देश में निर्माण की रफ्तार तेज हो, लेकिन गुणवत्ता उससे भी तेज हो। क्योंकि मजबूत भारत केवल बड़ी परियोजनाओं से नहीं, मजबूत नींव से बनता है।



  • इंजीनियर्स डे : विकास की नींव दिखती नहीं, लेकिन उसी पर पूरा देश खड़ा है

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    इंजीनियर्स डे
    संपादकीय   - नीमच[15-09-2026]
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    संपादकीय

    आज इंजीनियर्स डे है। यानी वह दिन, जब हम उन लोगों को याद करते हैं जिनकी बनाई चीजों का इस्तेमाल तो हम रोज करते हैं, लेकिन बनाने वाले का नाम अक्सर हमें पता भी नहीं होता। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल से लेकर घर की बिजली, पानी की व्यवस्था, सड़क, पुल, वाहन, अस्पताल की मशीनें, इंटरनेट और फिर दिनभर इस्तेमाल होने वाली तमाम तकनीक—इन सबके पीछे कहीं न कहीं किसी इंजीनियर की सोच, मेहनत और गणना छिपी होती है।

    भारत में इंजीनियर्स डे हर वर्ष 15 सितंबर को मनाया जाता है। यह दिन देश के महान अभियंता और भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। विश्वेश्वरैया ने इंजीनियरिंग को केवल नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया। यही बात आज के दौर में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

    लेकिन इंजीनियरिंग की असली कहानी सिर्फ बड़ी-बड़ी परियोजनाओं, चमचमाते पुलों और ऊंची इमारतों की नहीं है। इसकी असली परीक्षा वहां होती है, जहां सड़क पहली बारिश में टूटती है, नाली बनकर भी पानी सड़क पर बहता है, पुल बनने के कुछ साल बाद मरम्मत मांगने लगता है या किसी भवन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होते हैं।

    यहीं एक सवाल सामने आता है—क्या हमने इंजीनियरिंग को सिर्फ निर्माण तक सीमित कर दिया है या उसे जिम्मेदारी से भी जोड़ा है?

     

    कागज पर सड़क की लंबाई पूरी हो जाती है, बिल पास हो जाता है और उद्घाटन भी हो जाता है। लेकिन जनता के लिए असली उद्घाटन तब होता है, जब बारिश में सड़क बची रहे, ट्रैफिक में पुल काम आए और नाली पानी को सड़क पर आने से रोक दे। आखिर जनता को यह जानने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती कि परियोजना की फाइल कितनी मोटी थी; उसे यह देखना होता है कि काम कितना मजबूत था।

    हल्का व्यंग्य यही है कि हमारे यहां कई बार सड़क बनने से पहले उसका उद्घाटन हो जाता है और सड़क टूटने के बाद उसकी जिम्मेदारी ढूंढी जाती है। इंजीनियर के सामने तकनीकी चुनौती होती है, लेकिन उससे बड़ी चुनौती कई बार व्यवस्था की होती है—समय का दबाव, बजट की सीमा, बदलती जरूरतें और गुणवत्ता को लेकर समझौते का दबाव।

    आज इंजीनियरिंग का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, ड्रोन, स्मार्ट सिटी, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक निर्माण तकनीक ने इंजीनियर की भूमिका को और व्यापक बना दिया है। अब इंजीनियर के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं है कि कुछ बनाया कैसे जाए, बल्कि यह भी है कि उसे कम लागत में, सुरक्षित तरीके से, पर्यावरण का ध्यान रखते हुए और लंबे समय तक उपयोगी कैसे बनाया जाए।

    भारत जैसे विशाल और विविध देश में यह जिम्मेदारी और बड़ी हो जाती है। यहां एक तरफ अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत है तो दूसरी तरफ गांवों में सड़क, सिंचाई, स्वच्छ पानी, बिजली और मजबूत सार्वजनिक ढांचे की भी उतनी ही आवश्यकता है। इसलिए इंजीनियरिंग की सफलता केवल किसी बड़ी परियोजना की ऊंचाई से नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से मापी जानी चाहिए।

    एक अच्छा इंजीनियर वह नहीं जो सिर्फ नक्शा बना दे। अच्छा इंजीनियर वह है जो आने वाले वर्षों की जरूरत को आज समझ सके। जो सुरक्षा को लागत से नीचे न रखे। जो गुणवत्ता को कागज की खानापूर्ति न बनने दे। और सबसे महत्वपूर्ण—जो यह समझे कि उसके हस्ताक्षर केवल एक फाइल पर नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी और सुविधा पर असर डाल सकते हैं।

    आज जब हम इंजीनियर्स डे मना रहे हैं, तब हमें इंजीनियरों से सिर्फ नई सड़कें, नए पुल और नई इमारतें बनाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हमें उनसे बेहतर सोच, टिकाऊ समाधान और ईमानदार तकनीकी निर्णय की उम्मीद भी करनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर समाज और सरकार की भी जिम्मेदारी है कि इंजीनियरों को सही संसाधन, स्वतंत्र तकनीकी निर्णय और गुणवत्ता के लिए आवश्यक समय दिया जाए।

    क्योंकि विकास का मतलब सिर्फ यह नहीं कि हमारे शहर में क्या नया बना। विकास का असली अर्थ यह है कि जो बना है, वह कितने वर्षों तक मजबूती से हमारे काम आता है।

     

    इंजीनियर अक्सर पर्दे के पीछे रहता है। उद्घाटन के मंच पर शायद उसका नाम सबसे बड़े अक्षरों में न लिखा हो, लेकिन जिस पुल से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, जिस पानी की लाइन से घरों तक पानी पहुंचता है और जिस तकनीक से हमारी जिंदगी आसान होती है—वह उसकी सोच की कहानी जरूर कहती है।

    इस इंजीनियर्स डे पर सलाम उन सभी इंजीनियरों को, जो ईंट-पत्थर से ज्यादा भविष्य की नींव रखते हैं।

    और साथ ही एक उम्मीद भी—देश में निर्माण की रफ्तार तेज हो, लेकिन गुणवत्ता उससे भी तेज हो। क्योंकि मजबूत भारत केवल बड़ी परियोजनाओं से नहीं, मजबूत नींव से बनता है।

  • संपादकीय: अंधा बाँटे रेवड़ी... नीमच में सरकारी जमीन, गुमटियों और आंदोलन की राजनीति पर सवाल

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[25-08-2026]
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  • संपादकीय: अंधा बाँटे रेवड़ी... नीमच में सरकारी जमीन, गुमटियों और आंदोलन की राजनीति पर सवाल

    अंधा बाँटे रेवड़ी... नीमच में सरकारी जमीन, गुमटियों और आंदोलन की राजनीति पर सवाल
    संपादकीय   - नीमच[25-08-2026]
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  • विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: अखंड भारत की स्मृति से आज के भारत तक

    विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस:
    संपादकीय   - नीमच[14-08-2026]
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     अखंड भारत की स्मृति से आज के भारत तक
    संपादकीय   - नीमच[14-08-2026]
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  • पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक: क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?

    पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक:
    संपादकीय   - नीमच[12-08-2026]
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  • प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां: क्या आपको पता है, अपने ही लिखे साहित्य में उन्हें सबसे ज्यादा कौन-सी कहानियां प्रिय थीं?

    प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां:
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  • 1 जुलाई: जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं

    1 जुलाई:
    संपादकीय   - नीमच[30-06-2026]
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  • 1 जुलाई: जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं

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  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

    पर्यावरण दिवस Special:
    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
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  • संपादकीय: नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
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    नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...
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    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
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  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

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    कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी
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    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
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  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

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  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

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