• संपादकीय : कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
  • मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी): भारत में रेल आज भी सबसे सस्ता और सुलभ साधन है यात्रा करने का। हर रेल यात्रा आपको एक नया अनुभव देती है। अपने बचपन में मैंने इंदौर देवास के बीच तृतीय श्रेणी के रेल डिब्बे में यात्रा की है, जो बाद में इतिहास हो गया।

    लम्बी रेल यात्रा की बात करूँ तो याद आती है 1975 में अपने शैक्षणिक भ्रमण की रेल यात्रा, जो उज्जैन से शुरू होकर मुम्बई, पुणे, अहमदाबाद, बड़ोदा होते हुए उज्जैन में खत्म हुई। मेरी रेल यात्राओं में देहरादून एक्सप्रेस का सबसे ज्यादा योगदान है। पहली लम्बी यात्रा इसी गाड़ी में नागदा से मुंबई के बीच हुई। तब इस गाड़ी में कोयले के इंजन लगते थे।

    बाद के दिनों में दिल्ली, हरिद्वार की कई यात्राओं में इस रेलगाड़ी का साथ रहा है। तब यह गाड़ी मेरठ से हरिद्वार के बीच झिगझाग जैसे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर चलती थी। इसकी पहली यात्रा द्वितीय श्रेणी के सामान्य डिब्बे में हुई थी। इसमें हम दोस्त एक खिड़की बंद करने के लिए बहस कर रहे थे, लेकिन जब खिड़की बंद की तो पता लगा उसमें कांच ही नहीं था। तब हम सब के चेहरे देखने लायक थे।

    इसी पहली यात्रा में मुम्बई से पुणे के बीच तब की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित गाड़ी डेकन क्वीन में यात्रा करने का अवसर मिला, जिसमें पुणे के आसपास के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद भी शामिल था। कई वर्षों बाद मैं और मेरे एक मित्र डेकन क्वीन से मुंबई से पुणे जा रहे थे और कुली से गाड़ी में सीट दिलाने की बात तय होने के बाद भी भीड़ में शामिल हो गए। नतीजा—दोनों की जेब साफ, जिसमें टिकट भी शामिल थे। दोहरी पेनल्टी देकर वह यात्रा सम्पन्न हुई, और बाद में हम अपनी इस बेवकूफी को याद करके हँसते रहे।

    रेलगाड़ियों की लेटलतीफी कई बार आपके सारे यात्रा कार्यक्रम को बिगाड़ कर रख देती है। अनन्या एक्सप्रेस से चित्तौड़ से जसडीह (बाबा वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग) की यात्रा ऐसी ही थी। यह गाड़ी 10 घंटे देरी से सुबह के बजाय शाम को जसडीह पहुँची। स्टेशन पर एक और परेशानी इंतजार कर रही थी—रिटायरिंग रूम की बुकिंग में रेलवे टाइम को ध्यान से न देखने के कारण पता लगा कि रिटायरिंग रूम रात 8 बजे मिलेगा।

    खैर, जैसे-तैसे तैयार होकर स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर बाबा के दर्शन करने चले, जहाँ शायद डेढ़ घंटा लगा होगा। गुवाहाटी के लिए वापस आधी रात को फिर ट्रेन के इंतजार में स्टेशन पर। मेरा टिकट अवध असम एक्सप्रेस का था, लेकिन उसके आने के समय पर किसी अन्य गाड़ी की उद्घोषणा हो रही थी। मैंने टीसी से पूछा तो उन्होंने बताया कि अवध असम एक्सप्रेस लिंक एक्सप्रेस है और एक-दो स्टेशन पहले अन्य गाड़ी में जुड़ जाती है। उनकी इस जानकारी ने मेरे भ्रम को दूर कर दिया।

    इसी यात्रा में टिकट में समय देखने के बाद भी यह गलतफहमी हो गई कि ट्रेन गुवाहाटी रात 3 बजे पहुँचेगी। यह तो भला हो यात्रियों के आपस में बात करने की आदत का। मेरी श्रीमती जी ने मुझसे कहा कि यह गाड़ी तो दिन में 3 बजे ही गुवाहाटी पहुँच जाएगी। यदि यह चर्चा नहीं होती तो पता नहीं हम कहाँ पहुँच जाते।

    इसी यात्रा के समापन में हम सियालदह एक्सप्रेस से कोलकाता से भरतपुर आ रहे थे। गाड़ी चार घंटा देरी से भरतपुर पहुँची, नतीजा—मेवाड़ एक्सप्रेस जा चुकी थी। अब आधी रात को देहरादून एक्सप्रेस में जाने के लिए टीसी से लिखवाने के बाद हम ट्रेन में बैठे, तो पता लगा बर्थ तो मिलने से रही। जहाँ रेलगाड़ी में कई बार लोग अपनी सीट बदलने को तैयार नहीं होते, वहीं एक युवक ने मेरी श्रीमतीजी से कहा—आप मेरी बर्थ पर आ जाइए, मैं नीचे फर्श पर सो जाऊँगा। मैंने कहा कि तुम क्यों परेशान होते हो, पर वह नहीं माना।

    मसूरी एक्सप्रेस में कुछ डिब्बे हरिद्वार से जुड़ते थे। भीड़ और शोरगुल के बीच केवल एक बार यह घोषणा मेरे कानों में पड़ी थी कि यात्री मसूरी एक्सप्रेस में शयनयान के डिब्बे जुड़ने तक प्रतीक्षा करें। गाड़ी आई, हमने पूरी गाड़ी देख ली—कहीं हमारा डिब्बा नहीं मिला। तब मुझे वह घोषणा याद आई और मैंने अपने दामाद को बताया। उसके बाद दामाद जी ने इस लापरवाही के लिए स्टेशन मास्टर की खूब खिंचाई की। उन्हें मानना पड़ा कि हमें अधिक बार घोषणा करनी चाहिए थी।

    आखिरी अनुभव हाल ही का—ट्रेन वही देहरादून एक्सप्रेस। हरिद्वार से चलने के बाद ही गाड़ी लेट होना शुरू हो गई थी। ओखला में तार टूट जाने से और लेट हो गई। नतीजा—कोटा पहुँचते-पहुँचते 2 घंटे से ज्यादा लेट पहुँची। कोटा स्टेशन निर्माण के कारण इन दिनों बहुत अव्यवस्थित है। हम पति-पत्नी जैसे-तैसे सामान के साथ 2 नम्बर से 1 ए प्लेटफॉर्म पर पहुँचे, पता लगा कोटा मंदसौर गाड़ी अभी-अभी जा चुकी है।

    यह गाड़ी देहरादून एक्सप्रेस के लिए ही चलती है। यदि उसे 10 मिनट की देरी से भी चलाया जाता तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन लकीर के फकीर रेलवे के जिम्मेदारों को यात्रियों की तकलीफ से कोई लेना-देना नहीं है। उसी समय पाटलिपुत्र उदयपुर गाड़ी आ रही थी, तो मैंने उससे जाने के लिए जैसे-तैसे टीसी ऑफिस ढूंढा और वहाँ बैठे अधिकारी से कहा कि वे इस टिकट पर इस गाड़ी से जाने के लिए लिख दें।

    रेलवे में यह एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन उनका तर्क था कि चूँकि आपका यह टिकट नीमच तक का है, इसलिए आप इस गाड़ी के स्लीपर में चंदेरिया तक यात्रा कर सकते हैं—कुछ भी लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन उन्हें और मुझे कहाँ पता था कि एक और ज्यादा समझदार टीसी मिलने वाला है।

    फिर वही एक से तीन नम्बर की यात्रा कर जैसे-तैसे ट्रेन में बैठे। टीसी महोदय आए, मैंने उन्हें टिकट और अपनी कथा बताई, पर वे कुछ सुनने को तैयार नहीं—“आप बैठे कैसे? आपको हेड टीसी से लिखवाना था।” मैंने कहा—“यदि कोई लिखने को तैयार नहीं तो क्या हाथ पकड़कर लिखवाता?”
    “आपको जो करना है करते रहिए, मैं तो चार्ज बनाऊँगा।”

    मैंने कहा—“आपकी जितनी उम्र और नौकरी नहीं हुई, उससे दुगने समय से मैं रेल यात्रा कर रहा हूँ। मेरा टिकट नीमच तक है और आपको जो करना हो करो, मुझे जो करना होगा मैं कर लूँगा।”
    वे महाशय दूसरे टिकट चेक करने चले गए। इस बीच उन्हें बात समझ में आ गई, तो फिर वे वापस नहीं आए।

    रेल यात्रा के अनुभव अच्छे–बुरे दोनों होते हैं, फिर भी मेरी पहली पसंद रेलवे ही है, चाहे यात्रा कितनी भी लंबी क्यों न हो। कोयले के इंजन के युग में मीटर गेज पर खूब यात्रा की, जो अपने तय समय से घंटों देरी से चलती थी, तो आज आधुनिकतम ट्रेन और समय पर पहुँचने की अधिकतम संभावना है।

    रेल यात्रा आज भी सबसे सस्ती और आरामदायक है। रेल यात्रा के बाद रुकने के लिए रेलवे के रिटायरिंग रूम मेरी पहली पसंद है। ये साफ-सुथरे व सस्ते भी हैं। इनको ऑनलाइन बुक किया जा सकता है। इसलिए आम आदमी से लेकर खास तक सब इसके यात्री और मुरीद हैं।







  • संपादकीय : कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]

    मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी): भारत में रेल आज भी सबसे सस्ता और सुलभ साधन है यात्रा करने का। हर रेल यात्रा आपको एक नया अनुभव देती है। अपने बचपन में मैंने इंदौर देवास के बीच तृतीय श्रेणी के रेल डिब्बे में यात्रा की है, जो बाद में इतिहास हो गया।

    लम्बी रेल यात्रा की बात करूँ तो याद आती है 1975 में अपने शैक्षणिक भ्रमण की रेल यात्रा, जो उज्जैन से शुरू होकर मुम्बई, पुणे, अहमदाबाद, बड़ोदा होते हुए उज्जैन में खत्म हुई। मेरी रेल यात्राओं में देहरादून एक्सप्रेस का सबसे ज्यादा योगदान है। पहली लम्बी यात्रा इसी गाड़ी में नागदा से मुंबई के बीच हुई। तब इस गाड़ी में कोयले के इंजन लगते थे।

    बाद के दिनों में दिल्ली, हरिद्वार की कई यात्राओं में इस रेलगाड़ी का साथ रहा है। तब यह गाड़ी मेरठ से हरिद्वार के बीच झिगझाग जैसे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर चलती थी। इसकी पहली यात्रा द्वितीय श्रेणी के सामान्य डिब्बे में हुई थी। इसमें हम दोस्त एक खिड़की बंद करने के लिए बहस कर रहे थे, लेकिन जब खिड़की बंद की तो पता लगा उसमें कांच ही नहीं था। तब हम सब के चेहरे देखने लायक थे।

    इसी पहली यात्रा में मुम्बई से पुणे के बीच तब की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित गाड़ी डेकन क्वीन में यात्रा करने का अवसर मिला, जिसमें पुणे के आसपास के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद भी शामिल था। कई वर्षों बाद मैं और मेरे एक मित्र डेकन क्वीन से मुंबई से पुणे जा रहे थे और कुली से गाड़ी में सीट दिलाने की बात तय होने के बाद भी भीड़ में शामिल हो गए। नतीजा—दोनों की जेब साफ, जिसमें टिकट भी शामिल थे। दोहरी पेनल्टी देकर वह यात्रा सम्पन्न हुई, और बाद में हम अपनी इस बेवकूफी को याद करके हँसते रहे।

    रेलगाड़ियों की लेटलतीफी कई बार आपके सारे यात्रा कार्यक्रम को बिगाड़ कर रख देती है। अनन्या एक्सप्रेस से चित्तौड़ से जसडीह (बाबा वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग) की यात्रा ऐसी ही थी। यह गाड़ी 10 घंटे देरी से सुबह के बजाय शाम को जसडीह पहुँची। स्टेशन पर एक और परेशानी इंतजार कर रही थी—रिटायरिंग रूम की बुकिंग में रेलवे टाइम को ध्यान से न देखने के कारण पता लगा कि रिटायरिंग रूम रात 8 बजे मिलेगा।

    खैर, जैसे-तैसे तैयार होकर स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर बाबा के दर्शन करने चले, जहाँ शायद डेढ़ घंटा लगा होगा। गुवाहाटी के लिए वापस आधी रात को फिर ट्रेन के इंतजार में स्टेशन पर। मेरा टिकट अवध असम एक्सप्रेस का था, लेकिन उसके आने के समय पर किसी अन्य गाड़ी की उद्घोषणा हो रही थी। मैंने टीसी से पूछा तो उन्होंने बताया कि अवध असम एक्सप्रेस लिंक एक्सप्रेस है और एक-दो स्टेशन पहले अन्य गाड़ी में जुड़ जाती है। उनकी इस जानकारी ने मेरे भ्रम को दूर कर दिया।

    इसी यात्रा में टिकट में समय देखने के बाद भी यह गलतफहमी हो गई कि ट्रेन गुवाहाटी रात 3 बजे पहुँचेगी। यह तो भला हो यात्रियों के आपस में बात करने की आदत का। मेरी श्रीमती जी ने मुझसे कहा कि यह गाड़ी तो दिन में 3 बजे ही गुवाहाटी पहुँच जाएगी। यदि यह चर्चा नहीं होती तो पता नहीं हम कहाँ पहुँच जाते।

    इसी यात्रा के समापन में हम सियालदह एक्सप्रेस से कोलकाता से भरतपुर आ रहे थे। गाड़ी चार घंटा देरी से भरतपुर पहुँची, नतीजा—मेवाड़ एक्सप्रेस जा चुकी थी। अब आधी रात को देहरादून एक्सप्रेस में जाने के लिए टीसी से लिखवाने के बाद हम ट्रेन में बैठे, तो पता लगा बर्थ तो मिलने से रही। जहाँ रेलगाड़ी में कई बार लोग अपनी सीट बदलने को तैयार नहीं होते, वहीं एक युवक ने मेरी श्रीमतीजी से कहा—आप मेरी बर्थ पर आ जाइए, मैं नीचे फर्श पर सो जाऊँगा। मैंने कहा कि तुम क्यों परेशान होते हो, पर वह नहीं माना।

    मसूरी एक्सप्रेस में कुछ डिब्बे हरिद्वार से जुड़ते थे। भीड़ और शोरगुल के बीच केवल एक बार यह घोषणा मेरे कानों में पड़ी थी कि यात्री मसूरी एक्सप्रेस में शयनयान के डिब्बे जुड़ने तक प्रतीक्षा करें। गाड़ी आई, हमने पूरी गाड़ी देख ली—कहीं हमारा डिब्बा नहीं मिला। तब मुझे वह घोषणा याद आई और मैंने अपने दामाद को बताया। उसके बाद दामाद जी ने इस लापरवाही के लिए स्टेशन मास्टर की खूब खिंचाई की। उन्हें मानना पड़ा कि हमें अधिक बार घोषणा करनी चाहिए थी।

    आखिरी अनुभव हाल ही का—ट्रेन वही देहरादून एक्सप्रेस। हरिद्वार से चलने के बाद ही गाड़ी लेट होना शुरू हो गई थी। ओखला में तार टूट जाने से और लेट हो गई। नतीजा—कोटा पहुँचते-पहुँचते 2 घंटे से ज्यादा लेट पहुँची। कोटा स्टेशन निर्माण के कारण इन दिनों बहुत अव्यवस्थित है। हम पति-पत्नी जैसे-तैसे सामान के साथ 2 नम्बर से 1 ए प्लेटफॉर्म पर पहुँचे, पता लगा कोटा मंदसौर गाड़ी अभी-अभी जा चुकी है।

    यह गाड़ी देहरादून एक्सप्रेस के लिए ही चलती है। यदि उसे 10 मिनट की देरी से भी चलाया जाता तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन लकीर के फकीर रेलवे के जिम्मेदारों को यात्रियों की तकलीफ से कोई लेना-देना नहीं है। उसी समय पाटलिपुत्र उदयपुर गाड़ी आ रही थी, तो मैंने उससे जाने के लिए जैसे-तैसे टीसी ऑफिस ढूंढा और वहाँ बैठे अधिकारी से कहा कि वे इस टिकट पर इस गाड़ी से जाने के लिए लिख दें।

    रेलवे में यह एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन उनका तर्क था कि चूँकि आपका यह टिकट नीमच तक का है, इसलिए आप इस गाड़ी के स्लीपर में चंदेरिया तक यात्रा कर सकते हैं—कुछ भी लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन उन्हें और मुझे कहाँ पता था कि एक और ज्यादा समझदार टीसी मिलने वाला है।

    फिर वही एक से तीन नम्बर की यात्रा कर जैसे-तैसे ट्रेन में बैठे। टीसी महोदय आए, मैंने उन्हें टिकट और अपनी कथा बताई, पर वे कुछ सुनने को तैयार नहीं—“आप बैठे कैसे? आपको हेड टीसी से लिखवाना था।” मैंने कहा—“यदि कोई लिखने को तैयार नहीं तो क्या हाथ पकड़कर लिखवाता?”
    “आपको जो करना है करते रहिए, मैं तो चार्ज बनाऊँगा।”

    मैंने कहा—“आपकी जितनी उम्र और नौकरी नहीं हुई, उससे दुगने समय से मैं रेल यात्रा कर रहा हूँ। मेरा टिकट नीमच तक है और आपको जो करना हो करो, मुझे जो करना होगा मैं कर लूँगा।”
    वे महाशय दूसरे टिकट चेक करने चले गए। इस बीच उन्हें बात समझ में आ गई, तो फिर वे वापस नहीं आए।

    रेल यात्रा के अनुभव अच्छे–बुरे दोनों होते हैं, फिर भी मेरी पहली पसंद रेलवे ही है, चाहे यात्रा कितनी भी लंबी क्यों न हो। कोयले के इंजन के युग में मीटर गेज पर खूब यात्रा की, जो अपने तय समय से घंटों देरी से चलती थी, तो आज आधुनिकतम ट्रेन और समय पर पहुँचने की अधिकतम संभावना है।

    रेल यात्रा आज भी सबसे सस्ती और आरामदायक है। रेल यात्रा के बाद रुकने के लिए रेलवे के रिटायरिंग रूम मेरी पहली पसंद है। ये साफ-सुथरे व सस्ते भी हैं। इनको ऑनलाइन बुक किया जा सकता है। इसलिए आम आदमी से लेकर खास तक सब इसके यात्री और मुरीद हैं।