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  • संपादकीय : करनाल में 75 वर्षीय डॉक्टर की दर्दनाक हालत – परिवार विदेश में, बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार | समाज के लिए बड़ा सवाल

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[26-02-2026]
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  • हरियाणा के करनाल से सामने आई एक घटना ने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। 75 वर्षीय बुजुर्ग डॉक्टर, जिन्होंने जीवनभर लोगों का निःशुल्क इलाज किया, अपने अंतिम दिनों में ऐसी बदहाल स्थिति में पाए गए कि देखने वालों की रूह कांप उठी।

    डॉ. हरकृष्ण सिंह—एक ऐसा नाम जिसे इलाके के लोग सेवा, सादगी और समर्पण के प्रतीक के रूप में जानते थे। साइकिल पर चलकर मरीजों का इलाज करना, धर्मशालाओं और गुरुद्वारों में मुफ्त सेवा देना, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मदद करना—यही उनका जीवन था। लेकिन विडंबना देखिए, जीवनभर दूसरों को राहत देने वाला यह व्यक्ति अपने ही घर में उपेक्षा और अकेलेपन से जूझता रहा।

     


    घर में गंदगी, शरीर पर घाव और कीड़े

    जब स्थानीय लोगों की सूचना पर एक संस्था की रेस्क्यू टीम उनके घर पहुँची, तो हालात बेहद भयावह थे। कमरे में इतनी गंदगी थी कि दरवाजा खुलते ही बदबू बाहर तक फैल गई। डॉक्टर साहब एक खाट पर पड़े थे। शरीर मल-मूत्र से सना हुआ था, कई जगहों पर घाव हो चुके थे और उन पर कीड़े चल रहे थे। बताया गया कि वे कई महीनों से न नहाए थे, न कपड़े बदले थे।

    यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की शारीरिक अवस्था का नहीं था, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुका था।


    परिवार विदेश में, पिता अकेले

    सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डॉक्टर साहब आर्थिक रूप से संपन्न थे। उनका परिवार—पत्नी, बेटा और बेटी—विदेश में, विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में बस चुका है। शहर में उनकी बड़ी कोठी किराए पर दी हुई थी। आर्थिक कमी नहीं थी, लेकिन भावनात्मक सहारा पूरी तरह से अनुपस्थित था।

    सवाल उठता है—क्या भौतिक सफलता की दौड़ में हम अपने रिश्तों की जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं?
    क्या माता-पिता की देखभाल केवल आर्थिक सहायता तक सीमित रह गई है?


    समाज की भूमिका कहाँ थी?

    पड़ोसियों को बदबू और उनकी हालत का अंदाजा काफी समय से था। लेकिन सूचना तब दी गई जब स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी। यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है—क्या हम केवल दर्शक बनकर रह गए हैं?

    आज के शहरी जीवन में लोग अपने-अपने दायरों में इतने सिमट गए हैं कि बगल के घर में रहने वाले बुजुर्ग की पीड़ा भी हमें तब तक दिखाई नहीं देती जब तक वह खबर न बन जाए।


    जीवनभर सेवा, अंत में उपेक्षा

    डॉ. हरकृष्ण सिंह ने शहर की कई धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं में अपनी सेवाएँ दीं। उन्होंने अनगिनत मरीजों का मुफ्त इलाज किया। गंभीर बीमारियों तक का होम्योपैथिक उपचार बिना शुल्क किया। उनके बारे में लोग कहते हैं कि वे सादगी से साइकिल पर चलते थे और हर जरूरतमंद के लिए उपलब्ध रहते थे।

    ऐसे व्यक्ति की अंतिम अवस्था इस प्रश्न को और भी गहरा कर देती है—क्या समाज अपने सेवाभावी लोगों को भूल जाता है?


    बुजुर्गों की बढ़ती समस्या: एक राष्ट्रीय चिंता

    भारत में तेजी से बदलती पारिवारिक संरचना, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति और विदेशों में बसने की होड़ ने बुजुर्गों की स्थिति को संवेदनशील बना दिया है।

    • कई बुजुर्ग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले हैं।

    • बच्चों की व्यस्त जीवनशैली और भौगोलिक दूरी रिश्तों में दूरी बढ़ा रही है।

    • पड़ोस और समुदाय की पारंपरिक भूमिका कमजोर होती जा रही है।

    यह घटना केवल करनाल की नहीं, बल्कि देश के अनेक शहरों की सच्चाई हो सकती है।


    क्या कानून पर्याप्त हैं?

    भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण के लिए कानून मौजूद हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका प्रभावी क्रियान्वयन हो रहा है? क्या केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं, या समाज में जागरूकता और नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है?


    हमें क्या सीख लेनी चाहिए?

    1. परिवार की जिम्मेदारी केवल आर्थिक नहीं, भावनात्मक भी है।

    2. समाज को अपने आसपास के बुजुर्गों पर ध्यान देना होगा।

    3. सरकार और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर निगरानी और सहायता तंत्र मजबूत करना चाहिए।

    4. विदेश में बसे बच्चों को नियमित संपर्क और देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।


    निष्कर्ष

    करनाल के इस बुजुर्ग डॉक्टर की कहानी केवल एक समाचार नहीं, बल्कि चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन की असली सफलता केवल विदेश में बसने या संपत्ति बनाने में नहीं, बल्कि अपने रिश्तों को निभाने में है।

    यदि हम आज भी नहीं जागे, तो कल यह कहानी किसी और शहर, किसी और घर, और शायद हमारे अपने परिवार की भी हो सकती है।

    समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अब समय है आत्ममंथन का—कहीं हम भी तो किसी दरवाजे के पीछे छिपी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं कर रहे?



  • संपादकीय : करनाल में 75 वर्षीय डॉक्टर की दर्दनाक हालत – परिवार विदेश में, बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार | समाज के लिए बड़ा सवाल

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[26-02-2026]
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    हरियाणा के करनाल से सामने आई एक घटना ने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। 75 वर्षीय बुजुर्ग डॉक्टर, जिन्होंने जीवनभर लोगों का निःशुल्क इलाज किया, अपने अंतिम दिनों में ऐसी बदहाल स्थिति में पाए गए कि देखने वालों की रूह कांप उठी।

    डॉ. हरकृष्ण सिंह—एक ऐसा नाम जिसे इलाके के लोग सेवा, सादगी और समर्पण के प्रतीक के रूप में जानते थे। साइकिल पर चलकर मरीजों का इलाज करना, धर्मशालाओं और गुरुद्वारों में मुफ्त सेवा देना, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मदद करना—यही उनका जीवन था। लेकिन विडंबना देखिए, जीवनभर दूसरों को राहत देने वाला यह व्यक्ति अपने ही घर में उपेक्षा और अकेलेपन से जूझता रहा।

     


    घर में गंदगी, शरीर पर घाव और कीड़े

    जब स्थानीय लोगों की सूचना पर एक संस्था की रेस्क्यू टीम उनके घर पहुँची, तो हालात बेहद भयावह थे। कमरे में इतनी गंदगी थी कि दरवाजा खुलते ही बदबू बाहर तक फैल गई। डॉक्टर साहब एक खाट पर पड़े थे। शरीर मल-मूत्र से सना हुआ था, कई जगहों पर घाव हो चुके थे और उन पर कीड़े चल रहे थे। बताया गया कि वे कई महीनों से न नहाए थे, न कपड़े बदले थे।

    यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की शारीरिक अवस्था का नहीं था, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुका था।


    परिवार विदेश में, पिता अकेले

    सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डॉक्टर साहब आर्थिक रूप से संपन्न थे। उनका परिवार—पत्नी, बेटा और बेटी—विदेश में, विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में बस चुका है। शहर में उनकी बड़ी कोठी किराए पर दी हुई थी। आर्थिक कमी नहीं थी, लेकिन भावनात्मक सहारा पूरी तरह से अनुपस्थित था।

    सवाल उठता है—क्या भौतिक सफलता की दौड़ में हम अपने रिश्तों की जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं?
    क्या माता-पिता की देखभाल केवल आर्थिक सहायता तक सीमित रह गई है?


    समाज की भूमिका कहाँ थी?

    पड़ोसियों को बदबू और उनकी हालत का अंदाजा काफी समय से था। लेकिन सूचना तब दी गई जब स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी। यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है—क्या हम केवल दर्शक बनकर रह गए हैं?

    आज के शहरी जीवन में लोग अपने-अपने दायरों में इतने सिमट गए हैं कि बगल के घर में रहने वाले बुजुर्ग की पीड़ा भी हमें तब तक दिखाई नहीं देती जब तक वह खबर न बन जाए।


    जीवनभर सेवा, अंत में उपेक्षा

    डॉ. हरकृष्ण सिंह ने शहर की कई धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं में अपनी सेवाएँ दीं। उन्होंने अनगिनत मरीजों का मुफ्त इलाज किया। गंभीर बीमारियों तक का होम्योपैथिक उपचार बिना शुल्क किया। उनके बारे में लोग कहते हैं कि वे सादगी से साइकिल पर चलते थे और हर जरूरतमंद के लिए उपलब्ध रहते थे।

    ऐसे व्यक्ति की अंतिम अवस्था इस प्रश्न को और भी गहरा कर देती है—क्या समाज अपने सेवाभावी लोगों को भूल जाता है?


    बुजुर्गों की बढ़ती समस्या: एक राष्ट्रीय चिंता

    भारत में तेजी से बदलती पारिवारिक संरचना, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति और विदेशों में बसने की होड़ ने बुजुर्गों की स्थिति को संवेदनशील बना दिया है।

    • कई बुजुर्ग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले हैं।

    • बच्चों की व्यस्त जीवनशैली और भौगोलिक दूरी रिश्तों में दूरी बढ़ा रही है।

    • पड़ोस और समुदाय की पारंपरिक भूमिका कमजोर होती जा रही है।

    यह घटना केवल करनाल की नहीं, बल्कि देश के अनेक शहरों की सच्चाई हो सकती है।


    क्या कानून पर्याप्त हैं?

    भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण के लिए कानून मौजूद हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका प्रभावी क्रियान्वयन हो रहा है? क्या केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं, या समाज में जागरूकता और नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है?


    हमें क्या सीख लेनी चाहिए?

    1. परिवार की जिम्मेदारी केवल आर्थिक नहीं, भावनात्मक भी है।

    2. समाज को अपने आसपास के बुजुर्गों पर ध्यान देना होगा।

    3. सरकार और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर निगरानी और सहायता तंत्र मजबूत करना चाहिए।

    4. विदेश में बसे बच्चों को नियमित संपर्क और देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।


    निष्कर्ष

    करनाल के इस बुजुर्ग डॉक्टर की कहानी केवल एक समाचार नहीं, बल्कि चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन की असली सफलता केवल विदेश में बसने या संपत्ति बनाने में नहीं, बल्कि अपने रिश्तों को निभाने में है।

    यदि हम आज भी नहीं जागे, तो कल यह कहानी किसी और शहर, किसी और घर, और शायद हमारे अपने परिवार की भी हो सकती है।

    समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अब समय है आत्ममंथन का—कहीं हम भी तो किसी दरवाजे के पीछे छिपी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं कर रहे?

  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

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    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
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  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी
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  • संपादकीय: 1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान

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    संपादकीय   - नीमच[01-05-2026]
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  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
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  • कैलाश विजयवर्गीय: जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व

    कैलाश विजयवर्गीय:
    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
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    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
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  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

    90s का सबसे खट्टा-मीठा राज:
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

     कच्ची कैरी और बचपन की यादें
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[06-04-2026]
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  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

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    संपादकीय   - नीमच[03-04-2026]
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    नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल
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  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

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    संपादकीय   - नीमच[30-03-2026]
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  • संपादकीय: “सही करने” के नाम पर कमाई का माध्यम बनता एमओयू – आमजन की कीमत पर व्यवस्था का खेल

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    संपादकीय   - नीमच[26-03-2026]
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  • संपादकीय: 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष आरक्षण नहीं संरक्षण चाहिए मुफ्त की रेवड़ियाँ नहीं रोजगार चाहिए

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    संपादकीय   - नीमच[07-03-2026]
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    8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष  आरक्षण नहीं संरक्षण चाहिए मुफ्त की रेवड़ियाँ नहीं रोजगार चाहिए
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  • संपादकीय: करनाल में 75 वर्षीय डॉक्टर की दर्दनाक हालत – परिवार विदेश में, बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार | समाज के लिए बड़ा सवाल

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    संपादकीय   - नीमच[26-02-2026]
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  • 24 फरवरी का इतिहास: नानाजी देशमुख का जन्म और RSS पर प्रतिबंध का प्रभाव

    24 फरवरी का इतिहास:
    संपादकीय   - नीमच[24-02-2026]
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  • 12वीं के बाद की राह: सपनों को दिशा देने का सही समय

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    संपादकीय   - नीमच[22-02-2026]
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  • आज का दिन इतिहास में: विश्व सामाजिक न्याय दिवस

    आज का दिन इतिहास में:
    संपादकीय   - नीमच[20-02-2026]
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