• शहर : (09 मई रवीन्द्रनाथ टैगोर जयंती पर विशेष) टैगोर का शिक्षा दर्शन - डॉ. माधुरी चौरसिया

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    शहर
    शहर   - नीमच[09-05-2026]
  • मालवांचल मित्र, (डॉ. माधुरी चौरसिया): गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु पर उनके संबंध में महात्मा गांधी ने कहा था गुरुदेव की देह खाक में मिल चुकी है लेकिन उनके अंदर की ज्योत थी, जो उजाला था वहां सूरज की तरह था जो तब तक बना रहेगा जब तक धरती पर जीवन रहेगा।

    और यहां सच भी है कि सूरज की रोशनी जिस तरह हमें फायदा पहुंचाती है उसी तरह उनके विचारों की रोशनी हमारे आत्मा को प्रज्ज्वलित करती है।

    शिक्षा के प्रति टैगोर का दृष्टिकोण

    टैगोर ने कहां सर्वोत्तम शिक्षा वही है जो संपूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है। शिक्षा के प्रति उनके विचार आसपास के परिवेश से प्रभावित थे, जब उनका जन्म हुआ तब भारत में अंग्रेजी शासन अपनी चरम अवस्था पर था, और भारतीय अपने खोए हुए सब स्वाभिमान को फिर से पाने की कोशिश प्रारंभ कर रहे थे।

    रविंद्र नाथ जी ने अनुभव किया अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त शिक्षा प्रणाली उनके शासन के लिए क्लर्क बनाने की मशीनी शिक्षा प्रदान कर रही है, साथ ही अंग्रेज भारतीय के भीतर यह भावना भरना चाहते थे कि भारतीय यहाँ का दर्शन और संस्कृति को हीन समझें। भारतीय समाज को ज्ञान की दृष्टि से दिवालिया बना दिया गया था।

    रवींद्रनाथ जी को तत्कालीन शिक्षा रास नहीं आई और उन्होंने प्रारंभ में ही अपनी औपचारिक पढ़ाई छोड़ दी। उनका विचार था की प्रचलित विद्यालय विद्यागार नहीं बच्चों के लिए कारागर हैं।

    उनका कहना था शिशु को शिक्षा देने के लिए स्कूल नाम से जिस मंत्र का निर्माण हुआ उसके द्वारा मानक शिशु की शिक्षा कतई पूरी नहीं हो सकती, सच्ची शिक्षा के लिए आश्रम की जरूरत है, जहां समग्र जीवन की सजीव पृष्ठभूमि मौजूद रहती है।

    उन्होंने किशोरावस्था में विद्यालय जाना छोड़ दिया था उन्हें विद्यालय एक कारखाना लगा जो जीवन-विहीन संसार एवं प्रकृति से दूर था, अप्राकृतिक था, छात्रों को अनुशासन के नाम पर पाबंदी में रखा जाता था। छात्रों को प्रकृति का आनंद लेने की आजादी नहीं थी रटी रटाई शिक्षण पद्धतियों द्वारा उन्हें मशीनें बनाया जा रहा था।

    शिक्षा का उद्देश्य और बालक का विकास

    वे चाहते थे बालक की संवेदनशीलता को मारा न जाए वे शांति, प्रेम, दया और मूल्यों के लिए शिक्षा देने के हिमायती थे। वह बालक के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि संपूर्ण विकास को शिक्षा मानते थे।

    वे मानते थे शिक्षा का मूल उद्देश्य बालक का सामाजिक, बौद्धिक, धार्मिक, शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के माध्यम से सर्वांगीण विकास किया जाना आवश्यक है।

    रवीन्द्र नाथ जी कहते थे पेड़ों पर चढ़ने, तालाबों में डुबकियां लगाने, फूलों को तोड़ने तथा प्रकृति माता के साथ नाना प्रकार की अठखेलियाँ करने में बालक के विकास के साथ ही मस्तिष्क को आनंद तथा बचपन के स्वाभाविक आवेगों की संतुष्टि प्राप्त होती है।

    उनका मानना था छात्र निर्भय बने, उनका मस्तिष्क खुला या उन्मुक्त रहे, वे आत्मनिर्भर हों, उनमें अनुशासन स्व प्रेरक हो। इनकी जड़ भारत भूमि में गहरी हो परंतु सारे विश्व में फैली हो तथा मेल, भाईचारा वह सहयोग बढ़ाने वाली हो एवं भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो।

    शिक्षण प्रक्रिया और मातृभाषा का महत्व

    वे कहां करते थे सीखने सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता होनी चाहिए। ऊपर से थोपी गई क्रियाएं इसमें बाधक होती है। सीखने सिखाने में परिवेश पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। सीखने सिखाने में बाहर का दखल नहीं होना चाहिए।

    इसी तरह पाठ्य सामग्री जीवन संबद्ध चित्रों के परिपूर्ण एवं आकर्षक होनी चाहिए।

    सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कहीं की बालक की शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए मातृभाषा माँ की भाषा है जिसमें बालक सबसे ज्यादा अनुकूल रहता है।

    शिक्षा में सादगी, कला और शिक्षक की भूमिका

    टैगोर जी के अनुसार शिक्षा में सादगी हो साथ ही वह खर्चीली न हो। भवन एवं फर्नीचर पर किए जाने वाला खर्च पश्चिम का अनुकरण है।

    टैगोर का मानना था छात्रों में कला, संगीत,नृत्य और अभिनय के माध्यम में आत्म अभिव्यक्ति को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही वे विश्व बंधुत्व की भावना के विकास के हामी थे।

    उनके अनुसार शिक्षक को जेल वार्डन की तरह कठोर नहीं बल्कि मार्गदर्शक और मित्र होना चाहिए जो बच्चों को प्रेम और सहानुभूति से शिक्षा दे।

    पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ

    शिक्षा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपने पाठ्यक्रम में विभिन्न प्रकार के विषय और क्रियाओं को स्थान देते थे। वे इतिहास, विज्ञान, प्रकृति अध्ययन, भूगोल साहित्य आदि विषयों की शिक्षा देने पर जोर देते थे वहीं दूसरी ओर नाटक, भ्रमण, बागवानी, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रयोगशाला कार्य, ड्राइंग मौलिक रचना, अजायबघर एवं विभिन्न वस्तुओं को संग्रह कर सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित करवाना चाहते थे।

    वे छात्रों में खेलकूद, समाज सेवा एवं छात्र स्व-अनुशासन के भाव विकसित करना चाहते थे।

    शिक्षकों को वह ऐसी शिक्षण विधि अपनाने पर जोर देते थे जिसमें छात्र की स्वाभाविक रुचियां एवं आवेगों का विकास हो वे चाहते थे कि शिक्षक छात्रों को वाद-विवाद, प्रश्नोत्तर, नृत्य, अभिनय, दस्तकारी, व्यायाम जैसी क्रियाओं के माध्यम से शिक्षित करें।

    टैगोर के अनुसार भ्रमण के समय पढ़ाना सर्वोत्तम शिक्षण विधि हैं।

    शांति निकेतन और विश्व भारती

    टैगोर आधुनिक भारत में शैक्षिक पुनरुत्थान के सबसे महान पैगंबर थे उन्होंने अपने देश के सामने शिक्षा के सर्वोच्च आदर्श को स्थापित रखने के लिए निरंतर संघर्ष किया।

    उन्होंने 1901 में शांति निकेतन और 1921 में विश्व भारती की स्थापना की, जो प्रकृति की गोद में खुले वातावरण में शिक्षा देने के आदर्श पर आधारित थे।

    वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और टैगोर के विचारों की प्रासंगिकता

    आज की स्थिति में टैगोर के शैक्षिक विचारों को मानों भुला दिया गया हो। छात्रों को कंप्यूटर ए.आई. के सहयोग से मशीनी शिक्षा प्रदान की जा रही है, विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए यह आवश्यक भी है क्योंकि यह साधन सीखने की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान करते हैं एवं त्वरित शोध और डेटा आधारित मूल्यांकन के माध्यम से शिक्षा को अधिक सुलभ और प्रभावशील बनाते हैं लेकिन यह छात्रों के बीच बहुत बड़ी खाई के रूप में उपस्थित हो रही है जिन छात्रों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा नहीं वे गरीब और ग्रामीण छात्र पिछड़ रहे हैं।

    लगातार स्क्रीन के कारण शारीरिक समस्या उत्पन्न हो रही है बच्चों में एकाग्रता की कमी, अवसाद एवं अकेलापन बढ़ रहा है। सामाजिक अधिगम एवं भावनात्मक संबंधों में कमी आना, साइबर सुरक्षा, नकल एवं भ्रामक प्रचार जैसे अनेक कारण है जो छात्रों को समय से पहले बूढ़ा बना रहे हैं।

    अब जरूरत इस बात की है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में टैगोर एवं अन्य शिक्षा शास्त्रियों के विचारों का ध्यान रखते हुए शिक्षा का आधुनिकरण किया जाए तभी आज के बच्चे कल के अच्छे नागरिक बन पाएंगे।



  • शहर : (09 मई रवीन्द्रनाथ टैगोर जयंती पर विशेष) टैगोर का शिक्षा दर्शन - डॉ. माधुरी चौरसिया

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
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    शहर   - नीमच[09-05-2026]

    मालवांचल मित्र, (डॉ. माधुरी चौरसिया): गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु पर उनके संबंध में महात्मा गांधी ने कहा था गुरुदेव की देह खाक में मिल चुकी है लेकिन उनके अंदर की ज्योत थी, जो उजाला था वहां सूरज की तरह था जो तब तक बना रहेगा जब तक धरती पर जीवन रहेगा।

    और यहां सच भी है कि सूरज की रोशनी जिस तरह हमें फायदा पहुंचाती है उसी तरह उनके विचारों की रोशनी हमारे आत्मा को प्रज्ज्वलित करती है।

    शिक्षा के प्रति टैगोर का दृष्टिकोण

    टैगोर ने कहां सर्वोत्तम शिक्षा वही है जो संपूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है। शिक्षा के प्रति उनके विचार आसपास के परिवेश से प्रभावित थे, जब उनका जन्म हुआ तब भारत में अंग्रेजी शासन अपनी चरम अवस्था पर था, और भारतीय अपने खोए हुए सब स्वाभिमान को फिर से पाने की कोशिश प्रारंभ कर रहे थे।

    रविंद्र नाथ जी ने अनुभव किया अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त शिक्षा प्रणाली उनके शासन के लिए क्लर्क बनाने की मशीनी शिक्षा प्रदान कर रही है, साथ ही अंग्रेज भारतीय के भीतर यह भावना भरना चाहते थे कि भारतीय यहाँ का दर्शन और संस्कृति को हीन समझें। भारतीय समाज को ज्ञान की दृष्टि से दिवालिया बना दिया गया था।

    रवींद्रनाथ जी को तत्कालीन शिक्षा रास नहीं आई और उन्होंने प्रारंभ में ही अपनी औपचारिक पढ़ाई छोड़ दी। उनका विचार था की प्रचलित विद्यालय विद्यागार नहीं बच्चों के लिए कारागर हैं।

    उनका कहना था शिशु को शिक्षा देने के लिए स्कूल नाम से जिस मंत्र का निर्माण हुआ उसके द्वारा मानक शिशु की शिक्षा कतई पूरी नहीं हो सकती, सच्ची शिक्षा के लिए आश्रम की जरूरत है, जहां समग्र जीवन की सजीव पृष्ठभूमि मौजूद रहती है।

    उन्होंने किशोरावस्था में विद्यालय जाना छोड़ दिया था उन्हें विद्यालय एक कारखाना लगा जो जीवन-विहीन संसार एवं प्रकृति से दूर था, अप्राकृतिक था, छात्रों को अनुशासन के नाम पर पाबंदी में रखा जाता था। छात्रों को प्रकृति का आनंद लेने की आजादी नहीं थी रटी रटाई शिक्षण पद्धतियों द्वारा उन्हें मशीनें बनाया जा रहा था।

    शिक्षा का उद्देश्य और बालक का विकास

    वे चाहते थे बालक की संवेदनशीलता को मारा न जाए वे शांति, प्रेम, दया और मूल्यों के लिए शिक्षा देने के हिमायती थे। वह बालक के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि संपूर्ण विकास को शिक्षा मानते थे।

    वे मानते थे शिक्षा का मूल उद्देश्य बालक का सामाजिक, बौद्धिक, धार्मिक, शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के माध्यम से सर्वांगीण विकास किया जाना आवश्यक है।

    रवीन्द्र नाथ जी कहते थे पेड़ों पर चढ़ने, तालाबों में डुबकियां लगाने, फूलों को तोड़ने तथा प्रकृति माता के साथ नाना प्रकार की अठखेलियाँ करने में बालक के विकास के साथ ही मस्तिष्क को आनंद तथा बचपन के स्वाभाविक आवेगों की संतुष्टि प्राप्त होती है।

    उनका मानना था छात्र निर्भय बने, उनका मस्तिष्क खुला या उन्मुक्त रहे, वे आत्मनिर्भर हों, उनमें अनुशासन स्व प्रेरक हो। इनकी जड़ भारत भूमि में गहरी हो परंतु सारे विश्व में फैली हो तथा मेल, भाईचारा वह सहयोग बढ़ाने वाली हो एवं भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो।

    शिक्षण प्रक्रिया और मातृभाषा का महत्व

    वे कहां करते थे सीखने सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता होनी चाहिए। ऊपर से थोपी गई क्रियाएं इसमें बाधक होती है। सीखने सिखाने में परिवेश पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। सीखने सिखाने में बाहर का दखल नहीं होना चाहिए।

    इसी तरह पाठ्य सामग्री जीवन संबद्ध चित्रों के परिपूर्ण एवं आकर्षक होनी चाहिए।

    सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कहीं की बालक की शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए मातृभाषा माँ की भाषा है जिसमें बालक सबसे ज्यादा अनुकूल रहता है।

    शिक्षा में सादगी, कला और शिक्षक की भूमिका

    टैगोर जी के अनुसार शिक्षा में सादगी हो साथ ही वह खर्चीली न हो। भवन एवं फर्नीचर पर किए जाने वाला खर्च पश्चिम का अनुकरण है।

    टैगोर का मानना था छात्रों में कला, संगीत,नृत्य और अभिनय के माध्यम में आत्म अभिव्यक्ति को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही वे विश्व बंधुत्व की भावना के विकास के हामी थे।

    उनके अनुसार शिक्षक को जेल वार्डन की तरह कठोर नहीं बल्कि मार्गदर्शक और मित्र होना चाहिए जो बच्चों को प्रेम और सहानुभूति से शिक्षा दे।

    पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ

    शिक्षा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपने पाठ्यक्रम में विभिन्न प्रकार के विषय और क्रियाओं को स्थान देते थे। वे इतिहास, विज्ञान, प्रकृति अध्ययन, भूगोल साहित्य आदि विषयों की शिक्षा देने पर जोर देते थे वहीं दूसरी ओर नाटक, भ्रमण, बागवानी, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रयोगशाला कार्य, ड्राइंग मौलिक रचना, अजायबघर एवं विभिन्न वस्तुओं को संग्रह कर सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित करवाना चाहते थे।

    वे छात्रों में खेलकूद, समाज सेवा एवं छात्र स्व-अनुशासन के भाव विकसित करना चाहते थे।

    शिक्षकों को वह ऐसी शिक्षण विधि अपनाने पर जोर देते थे जिसमें छात्र की स्वाभाविक रुचियां एवं आवेगों का विकास हो वे चाहते थे कि शिक्षक छात्रों को वाद-विवाद, प्रश्नोत्तर, नृत्य, अभिनय, दस्तकारी, व्यायाम जैसी क्रियाओं के माध्यम से शिक्षित करें।

    टैगोर के अनुसार भ्रमण के समय पढ़ाना सर्वोत्तम शिक्षण विधि हैं।

    शांति निकेतन और विश्व भारती

    टैगोर आधुनिक भारत में शैक्षिक पुनरुत्थान के सबसे महान पैगंबर थे उन्होंने अपने देश के सामने शिक्षा के सर्वोच्च आदर्श को स्थापित रखने के लिए निरंतर संघर्ष किया।

    उन्होंने 1901 में शांति निकेतन और 1921 में विश्व भारती की स्थापना की, जो प्रकृति की गोद में खुले वातावरण में शिक्षा देने के आदर्श पर आधारित थे।

    वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और टैगोर के विचारों की प्रासंगिकता

    आज की स्थिति में टैगोर के शैक्षिक विचारों को मानों भुला दिया गया हो। छात्रों को कंप्यूटर ए.आई. के सहयोग से मशीनी शिक्षा प्रदान की जा रही है, विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए यह आवश्यक भी है क्योंकि यह साधन सीखने की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान करते हैं एवं त्वरित शोध और डेटा आधारित मूल्यांकन के माध्यम से शिक्षा को अधिक सुलभ और प्रभावशील बनाते हैं लेकिन यह छात्रों के बीच बहुत बड़ी खाई के रूप में उपस्थित हो रही है जिन छात्रों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा नहीं वे गरीब और ग्रामीण छात्र पिछड़ रहे हैं।

    लगातार स्क्रीन के कारण शारीरिक समस्या उत्पन्न हो रही है बच्चों में एकाग्रता की कमी, अवसाद एवं अकेलापन बढ़ रहा है। सामाजिक अधिगम एवं भावनात्मक संबंधों में कमी आना, साइबर सुरक्षा, नकल एवं भ्रामक प्रचार जैसे अनेक कारण है जो छात्रों को समय से पहले बूढ़ा बना रहे हैं।

    अब जरूरत इस बात की है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में टैगोर एवं अन्य शिक्षा शास्त्रियों के विचारों का ध्यान रखते हुए शिक्षा का आधुनिकरण किया जाए तभी आज के बच्चे कल के अच्छे नागरिक बन पाएंगे।

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